हमारा लक्ष्य और आपका सहयोग

प्रिय पाठकों, मित्रों, व सहयोगियों!

उम्मीद है dainikmanas.com की खबरों से आप संतुष्ट होंगे. दैनिक मानस (पूर्व में बोलते चित्र YouTube Channel जिसे वामपंथी हमलों की वजह से बंद होना पड़ा) ने बेहद कम समय में हिंदी भाषा में अपने पाठकों को विश्वसनीय पाठ्य सामग्री उपलब्ध कराई है, ताकि भारतीय शास्त्रार्थ परंपरा की राह पर चलते हुए देश में झूठे विमर्श के बल पर विकसित हो चुके बौद्धिक आतंकवाद को हम ध्वस्त कर सकें.

हमारी इस पहल का मकसद ही है, वामपंथी पत्रकारों व बुद्धिजीवियों द्वारा फैलाए जा रहे ‘फेक न्यूज’ को सामने लाना, ‘फेक नरेशन’ को तथ्यगत तरीके से एक्सपोज करना और भारतीय ज्ञान परंपरा यानी इंडोलॉजी को जन-जन तक पहुंचाना. इंडोलॉजी में हमारा साहित्य, हमारी संस्कृति, हमारा इतिहास, हमारे जीवन मूल्य, हमारा धर्म-यानी हमारी संपूर्ण सभ्यता समाहित है.

भारत झूठे विमर्श का दंड सदियों से भुगत रहा है, और यह प्रयास आज भी लगातार जारी है. मसीह, मोहम्मद, मार्क्स, मैकाले और माओवावादियों ने झूठे तथ्य और तर्क से बार-बार ‘राष्ट्र’ के चिंतन पर प्रहार किया है और यह साबित करने का प्रयास किया है कि भारत न कभी एक राष्ट्र था, न एक राष्ट्र है और न ही भविष्य में कभी एक राष्ट्र हो सकता है, जबकि ऋग्वेद में साफ-साफ राष्ट्र की व्याख्या प्रस्तुत की गई है.

इनका मकसद ही भारतीयों के विश्वास को तोड़ना रहा है ताकि भारतीयों में अपने इतिहास और संस्कृति के प्रति गर्व का भाव ही पैदा न हो सके. ऐसे में देश को तोड़ना बेहद आसान हो जाता है और यही इनका प्रयास है. भारत में जाति, संप्रदाय, भाषा, प्रांत आदि के झगड़े पैदा कर विभाजन की गहरी रेखा खींचने में इन्हीं का योगदान रहा है.

आदि शंकराचार्य से पूर्व ऐसे धर्मद्रोहियों को ‘पंच-मक्कारवादी’ कहा जाता था, आधुनिक काल में हमने इसे ‘पंच-मक्कार’ की संज्ञा दी है. आज के संदर्भ में इन ‘पंच-मक्कारवादियों’ (M5) को आप इस तरह समझिए – मसीहवाद यानी कन्वर्जन व विखंडन, मोहम्मदवाद यानी कट्टरता, अलगाव व आतंक, मार्क्सवाद यानी बौद्धिक पाखंड व धोखा, माओवाद यानी विद्रोह, नक्सलवाद व भारत को तोड़ने का प्रयास एवं मैकालेवाद यानी अंग्रेजीयत व अभिजातवर्गीय मानसिकता का प्रकटीकरण व भारतीय संस्कृति के प्रति हेयदृष्टि का बोध.

यह ‘पंच-मक्कार’ मिलकर ‘पांचवें स्तंभ’ का निर्माण करते हैं, जिनका मकसद हर हाल में देशद्रोही गतिविधियों को बढ़ावा देना और देश को अशांत व अस्थिर किए रखना है ताकि मौका पड़ने पर इसे छिन्न-भिन्न किया जा सके. इसमें शैक्षणिक, मीडिया एवं स्वयंसेवी (NGOs) संस्थानों और इससे बड़े पैमाने पर संबंधित प्रोफेसरों, पत्रकारों (खासकर अंग्रेजी पत्रकारों), साहित्यकारों, कलाकारों, फिल्मकारों, न्यायविदों और एक्टिविस्टों की बड़ी भूमिका है.

इन ‘पंच-मक्कारवादियों’ (M5) को जब तक वेब पोर्टल पर प्रति दिन तथ्यगत पोस्ट के जरिए हम तथ्य और तर्क के सहारे ध्वस्त नहीं करेंगे, वर्ष में कम से कम दो पुस्तकों का लेखन व प्रकाशन नहीं करेंगे और भारतीय ज्ञान परंपरा को जब तक बोलचाल की भाषा में जन-जन तक नहीं ले जाएंगे, तब तक हमारी आने वाली पीढ़ी यूं ही पथ भ्रष्ट होती रहेगी, जैसे आजतक हम सब होते रहे हैं. सीधे शब्दों में कहें तो हमें ‘असत्य विमर्श’ (Fake narratives) की जगह भारतीय विमर्श (Indigenous narratives) को बढ़ावा देना और लोगों में उसकी समझ विकसित करना होगा.

24 अप्रैल 2016 से दैनिक मानस के लिए अपना सब कुछ छोड़ कर, राष्ट्रीयता की सोच से भरे एक युवा ने कुछ पैसे इधर-उधर से जोड़ कर उपरोक्त उद्देश्यों को पूरा करने के लिए काम करना शुरु किया था. हम की इस सोच के समर्थक हैं कि ‘नौकरी लेने वाले नहीं, देने वाले बनिए’ हमने छोटे स्तर पर ही सही, इसकी शुरुआत कर दी है और ये गिरते पड़ते अभी तक सिर्फ मेरे और परिवार के निजी सहयोग से ये अनवरत चलता ही आ रहा है.

वर्तमान में आपके द्वारा दान के रूप में दी गई राशि का उपयोग हम दैनिक मानस के संचालन, वेब इंप्रूवमेंट, सर्वर मेंटिनेंस, कार्यालय किराया व खर्चे, भारतीय ज्ञान परंपरा व शास्त्रों को लेकर शोध, पुस्तकों की खरीद, आदि में करेंगे. भविष्य में हम साथ काम करने वालों का वेतन (अगर हम उतनी राशि जमा कर पाए की किसी को वेतन दे कर रख सके), स्वतंत्र लेखकों व पत्रकारों को मेहनताना आदि पर खर्च करने का सोच रहे है. डोनेशन/सदस्यता की रकम अभी आज तक तो कोई आई ही नहीं है, क्योकि शुरू में जहा तक हो सका मैंने इसे अपने निजी और परिवार के पैसों से ही चलाने की पूरी कोशिश की, पर अब मुझे लगता है (24 दिसम्बर 2018 से हमने ये सहयोग का पेज शुरू किया है) की किसी चीज को बंद कर देने से अच्छा सहयोग मांग लेना है. हर महीने करीब एक लाख रुपये खर्च हो रहे हैं, लेकिन दान से अभी कोई सहयोग नहीं आ पाया है. राष्ट्रवादी पत्रकारिता करने वालों के प्रति लोगों की उदासीनता सबसे बड़ी विडंबना है, जबकि देशतोड़क वामपंथी विचारधारा के वेब में करोड़ों की फंडिंग हो रही है! तभी तो आज हर देश विरोधी तथाकथित बड़ा पत्रकार दो-तीन बड़े वेब की छतरी के नीचे जमा होकर फेक न्यूज और फेक विमर्श की फैक्टरी चला रहे हैं.

अगर आप सहयोग करते है या नहीं करते है तो भी हम आपका धन्यवाद करते है क्योकि अपने यहाँ तक तो पढ़ा ही है और आप हमारे वेब-पोर्टल पे भी आये है, लेकिन अभी तो मैं अपनी निजी बचत से ही इसे चलाने का प्रयास कर रहा हूँ! यदि इसी तरह राष्ट्रवादियों की उदासीनता हावी रही तो भविष्य में हमें दैनिक मानस को बंद करना पड़ सकता है, जबकि 2019 का समर हमारे सामने है. यदि हजार-दो हजार लोग भी हर महीने अपनी बचत में से निकाल कर एक छोटी रकम दैनिक मानस को चलाने के लिए दान के रूप में दें तो उत्साहवद्धर्क शुरुआत हो सकती है और हम सुचारू रूप से एक बड़ी टीम बनाकर युद्धस्तर पर काम कर सकते हैं.

पत्रकारिता, लेखन, कला, साहित्य, इतिहास, सिनेमा के क्षेत्र में छद्म रूप धारण कर बैठे ‘पंच-मक्कारवादियों’ बुद्धिजीवियों के खिलाफ बौद्धिक लड़ाई में आपका योगदान महत्वपूर्ण है. इसलिए कृपया शास्त्रार्थ की इस भारतीय परंपरा में हमें सहयोग कर सहभागी बनें.

हम आपसे सहायता की अपेक्षा रखते हुए विश्वास दिलाते हैं कि छल, छद्म और देशद्रोह को बढ़ाने के प्रयास में जुटे बौद्धिक आतंकवादियों से सहमे जन-जन को तथ्य और तर्क से शास्त्रार्थ के लिए सक्षम बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे. हमारा टैग लाइन (मूलमंत्र) है – “सही समाचार | सही दृष्टि | सही मानस”. राष्ट्रवादी साथियों से आह्वान है कि आइए राष्ट्रवादी पत्रकारिता व लेखन के जरिए हम दशकों से चल रहे ‘फेक विमर्श’ (fake narratives) को ध्वस्त करें और राष्ट्र की मुख्यधारा के विमर्श (Indigenous narratives) को पुनः जिंदा कर स्वर्णिम भारत के स्वप्न को साकार करें! वंदेमातरम! जय हिंद! जय भारत!

दैनिक मानस – सही समाचार | सही दृष्टि | सही मानस

धन्यवाद!

अंशुमान सिंह चंदेल
संस्थापक/संपादक
दैनिक मानस

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