क्या प्रियंका गाँधी vs नरेंद्र मोदी होने जा रहा है लोकसभा चुनाव 2019?

यूपी में प्रियंका केवल कांग्रेस का ही आधार नहीं बनाएंगी, महागठबंधन को भी अच्छी खासी मदद करेंगी। यूपी के इस चुनावी गणित को समझने के लिए तीन बयान ही काफी हैं।

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नई दिल्ली: प्रियंका गांधी वाड्रा (Priyanka Gandhi Vadra) को अचानक पूर्वी उत्तर प्रदेश का महासचिव नियुक्त कर दिया गया। उन्हें न तो पूरे उत्तर प्रदेश की कमान सौंपी गई और न ही राष्ट्रीय स्तर पर कोई जिम्मेदारी सौंपी गई है। जानकारों का मानना है कि प्रियंका को सक्रिय राजनीति में लाने और पूर्वी उत्तर प्रदेश की कमान सौंपने का फैसला अचानक ही नहीं लिया गया है, बल्कि इसके पीछे एक सोची-समझी रणनीति है। इसकी वजह प्रियंका गांधी बनाम नरेंद्र मोदी के साथ ही कई निशाने साधने की हो सकती है।

प्रियंका गांधी को कांग्रेस का मास्टर स्ट्रोक मानने वालों के अनुसार लोकसभा चुनाव से ठीक पहले उन्हें पूर्वी उत्तर प्रदेश की कमान सौंपने की खास वजह है। दरअसल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की संसदीय सीट वाराणसी पूर्वी उत्तर प्रदेश में ही है और यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की वजह से गोरखपुर को भी भाजपा की पारंपरिक सीट माना जाता है। पूर्वी उत्तर प्रदेश की महासचिव के तौर पर प्रियंका गांधी इन दोनों सीटों पर भाजपा को सीधी चुनौती देंगी।

पूर्वी उत्तर प्रदेश में तकरीबन 30 संसदीय सीटें आती हैं, जहां भाजपा का दबदबा है। 2014 के लोकसभा चुनावों में मोदी लहर में भाजपा ने इन 30 सीटों में से केवल आजमगढ़ की एक सीट हारी थी। इस सीट पर मुलायम सिंह यादव को मुश्किल से जीत मिली थी। इसके अलावा मिर्जापुर की सीट पर भाजपा की सहयोगी पार्टी अपना दल ने कब्जा जमाया था। इसके अलावा पूर्वी उत्तर प्रदेश की सभी 28 सीटों भाजपा ने जीत दर्ज की थी।

प्रियंका गांधी को पूर्वी उत्तर प्रदेश की कमान सौंपकर कांग्रेस, नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ को तो सीधी चुनौती दे ही रही है, साथ ही उसका इरादा भाजपा के इस नए किले में सेंध लगाना भी है। कांग्रेस के लिए पूर्वी उत्तर प्रदेश इसलिए भी जरूरी है क्योंकि पार्टी का जनाधार यहां लगभग खत्म हो चुका है। वर्ष 2009 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने पूर्वी उत्तर प्रदेश में सात सीटों पर जीत दर्ज की थी, जबकि भाजपा को मात्र चार सीटें मिली थीं।

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कांग्रेस को उम्मीद है कि प्रियंका गांधी पूर्वी उत्तर प्रदेश में पार्टी को बढ़त दिला सकती हैं। इसकी वजह भी है, दरअसल 2014 लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा का पूर्वी उत्तर प्रदेश में प्रदर्शन बहुत अच्छा नहीं रहा है। इस चुनाव के बाद भी भाजपा की पूर्वी उत्तर प्रदेश में पकड़ कमजोर हुई है। दरअसल 2014 लोकसभा चुनाव के बाद पूर्वी उत्तर प्रदेश की दो सीटों फूलपुर और गोरखपुर पर उपचुनाव हुए थे और दोनों ही सीटों पर भाजपा को हार का मुंह देखना पड़ा था। यही कांग्रेस के उम्मीद की बड़ी वजह भी है।

सपा-बसपा-कांग्रेस के बयानों से साफ है यूपी का चुनावी गणित
प्रियंका गांधी को पूर्वी उत्तर प्रदेश की कमान सौंपने के पीछे पार्टी की रणनीति क्या है, इसका अंदाजा हाल में सपा, बसपा और कांग्रेस के बयानों से भी लगाया जा सकता है। यूपी में बसपा से गठबंधन के बाद सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने एक बयान में कहा ‘राहुल के लिए अपार सम्मान है, मगर चुनावी अंकगणित ठीक रखने के लिए कांग्रेस को गठबंधन से दूर रखा गया है।’ दूसरा बयान राहुल गांधी, जिसमें उन्होंने कहा ‘हमारी अखिलेश जी और मायावती जी से कोई दुश्मनी नहीं है, प्यार है। अगर वो आगे आकर बात करना चाहेंगे तो हम करेंगे।’ राहुल ने ये बयान प्रियंका गांधी के महासचिव बनने की घोषणा के ठीक बाद दिया था। इन बयानों से साफ है कि कांग्रेस का जोर लोकसभा चुनावों में यूपी से जीतने की जगह भाजपा को हराने पर है। अगर महागठबंधन में कांग्रेस चुनाव लड़ती तो उसे सीटों का बंटवारा करना पड़ता, ऐसे में वह सभी सीटों पर भाजपा के वोट नहीं काट पाती। सपा-बसपा के तय वोटों को छोड़ दें तो भाजपा के बाकी वोटों में कांग्रेस ही सेंध लगा सकती है। अब एक और बयान पर ध्यान दें, जो बसपा सुप्रीमो मायावती ने गठबंधन की घोषणा के वक्त दिया था। माया ने कहा था ‘कांग्रेस के वोट हमें ट्रांसफर नहीं होते’।

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